शायद मेरी नन्ही कोशिश
है बेबस तुम्हे मनाने में
में क्या बोलू में भी लेकिन
हूँ टूटा बहुत जमाने से
में शायद ऐसा नादां हु
समझू मैं नही तुम्हे अच्छे से
या फ़िर ऐसा भी हो जाने
तू खफा हो इस अंजाने से
में आज तुम्हे समझू इतनी
हिम्मत शायद न जुटा पाऊं
तू ही कुछ ऐसा कर ख़ुद को
समझा ले किसी बहाने से
बस आज तू मेरे साथ में चल
तुम बिन में बहुत अकेला हु
में बैठा हु कब से जाने
ये धड़कन तुम्हे सुनाने को
ऐ खुदा तू ऐसा जुल्म न कर
मुझपे थोड़ा सा रहम तो कर
में कब तक अपने घर में ही
यूँ ढूंडा करू ठिकाने को
सोमवार, 30 मार्च 2009
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