मंगलवार, 20 नवंबर 2007

Sentiments...

These is a subset of what i wrote in my adolescence when i used to like a girl. That's over long back but i still love what i wrote...


मौत को देखा कुछ इतने करीब से
मुझको मेरे अरमा लगे कितने गरीब से
यूं लगा जैसे सांस कई बार थम गयी
एक पल के लिए तुम जो निकले नसीब से
...

अबके आके भी वो कोई हादसा दे जाएगा
और उसके पास क्या है जो नया दे जाएगा

वो मेरा अपना है शायद साथ है कबसे मेरे
वक़्त आने दे जरा वो भी दगा दे जाएगा

है के खाली उसका दामन भी वफ़ा से जब यहाँ
फिर कहा से वो भला मुझको वफ़ा दे जाएगा
...

अब तो गम बिना ही आँख भर आती है इस तरह
एक - एक हमने गम को समेटा हो जिस तरह

बुझी बुझी सी शाम जैसा दिन है ये मेरा
एक- एक चराग-ऐ-दिल किसी ने लूटा हो जिस तरह

तेरे पाने में ख़ुशी है या गम सोचा तमाम उमर
कोई आसां सा एक सवाल न निकला हो जिस तरह

तेरी शिकायतों - गिलो का अब मैं क्या जवाब दु
मेरा दिल मुझसे खुद खफा है, कुछ खफा है इस तरह

हर घडी तुझे वफ़ा मिले बस इस ख़याल में
मैं खुद से बेवफा सा हो गया हूँ जिस तरह
...


1 टिप्पणी:

Harmanjit Singh ने कहा…

very nice, maybe you should try to make the hindi rendering flawless.